Monday, 27 July 2015

मुश्किल चुप रहना है...


सहसा यह क्या हुआ कठिन सहना है
मौन की अपनी भाषा पर मुश्किल
चुप रहना है....

हे हृदय सम्राट 
व्यक्ति हे मानव महा विराट
सदा ही मोहक सी मुस्कान
उच्चनतम भारत मां के ललाट
खो दिया पल में ही सबने
सुन्दरतम अपना गहना है...
सहसा ये क्‍या हुआ कठिन सहना है....
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हे बहुआयामी विकराल
बनाये तुमने शत्रु के काल
बजाये सबने अपने गाल
मगर तुम सौम्य रहे हर हाल
हां धारा सा प्रवाह ये जीवन 
सबको बहना है....
सहसा ये क्‍या हुआ कठिन सहना है....
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देश का खूब रखा सम्मान
देश को मिली नई पहचान
इस गुणसागर रस खान
अग्नि ने अन्तिम भरी उडान
अब कह ले दुनिया खूब
जिसे जो कुछ भी कहना है...
सहसा ये क्‍या हुआ कठिन सहना है...
मौन की अपनी भाषा पर मुश्किल
चुप रहना है ....
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(माननीय ए.पी.अब्‍दुल कलाम को सादर श्रद्धांजली)
मनोज

Tuesday, 14 April 2015

गौहत्या पर अनुचित प्रतिबंध



मित्रों, मुझे ज्ञात है कि मेरी बातें आपको बुरी लग सकती हैं, बहुत बुरी, परन्‍तु किसी बात को समझने के लिए उसकी पडताल की तो आवश्‍यक्‍ता होती है ना, तो कर लेते हैं, आपको पता ही है ना कि महाराष्‍ट्र में गौ-वध पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, और देश के अन्‍य भागों में भी इसी प्रकार के प्रतिबंध लगाया जाए, ऐसी मांग कतिपय लोगों तथा संगठनों द्वारा की जा रही है, ऐसे में उचित क्‍या है, मुझे गौ-वध पर लगा प्रतिबंध अनुचित नहीं लगता है, परन्‍तु समाज के दोहरे मानदंडों पर पीडा अवश्‍य होती है, एक ओर तो हम अपने आपको धार्मिक सिद्ध करने हेतु अनेकानेक उपक्रम करते दिखना चाहते हैं, तो दूसरी ओर स्‍वयं ही उन उपायों की धज्जियां उडाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते, अपने आपको गोवंश का हितैशी कहलाने में गर्वानुभूति करने वाले लोगों के पैरों की ओर जरा दृष्टि तो डालिए, आपको उनके पैरों में सजी गाय की चमडी के बने जूते और उनके कमर संभालते चमडी से बने बेल्‍ट सरलता से उनकी शोभा बढाते नजर आ जाएंगे, और यदि उनसे पूछा जाए कि जब आप गोवंश के इतने बडे रक्षक होने का दावा करते हैं, तो आप स्‍वयं इन वस्‍तुओं का उपयोग ही क्‍यों करते हैं तो उनके तर्क आपको हास्‍य हेतु विवश कर देंगे,
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गाय निश्चित रूप से एक उपयोगी पशु है, उनका दुग्‍ध सम्‍पूर्ण मानव जाति हेतु उपयोगी है, परन्‍तु इसी प्रकार से तो भैंसों का दुग्‍ध भी सभी के लिए प्रयुक्‍त होता है, अनेकानेक स्‍थलों पर बकरी और ऊंटनी का दूध भी प्रयोग में लाया जाता है ऐसे में सिर्फ गौ हत्‍या पर प्रतिबंध क्‍यों, सभी दुधारू पशुओं की हत्‍या पर प्रतिबंध होना चाहिए, परन्‍तु ऐसे में एक बात समझने की है, ठीक है मादा पशु के दुग्‍ध का सेवन किया जाता है और उनका संरक्षण किया जाना चाहिए परन्‍तु नर पशु का क्‍या, आज का समाज तकनीकि आधारित हो चला है, अब गांवों में भी जुताई हेतु बैलों का प्रयोग नहीं होता, उसका स्‍थान आधुनिक यंत्रों ने ले लिया है, ऐसे में प्रलाप करना तो सरल है, परन्‍तु खुद अर्थ के गर्त में दबा व्‍यक्ति जिसने हमेशा ही अपनी पालतू गाय का दूध पिया हो, दूध न देने की दशा में उसके भोजन का भार उठाने में न ही सक्षम होता है और न ही उठाना चाहता है, तो ऐसे में कौन महामानव मुफ्तखोर बैलों हेतु भोजन की व्‍यवस्‍था करेगा, और यदि कोई नहीं करेगा तो फिर होगा क्‍या, गौहत्‍या पर तो प्रतिबंध लगा दिया है जी आपने ...
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जी हां फिर होगा यह कि इन पशुओं को खुला छोड दिया जाएगा, अनुपयोगी पशु का उसका मालिक भी भला क्‍यों रखना चाहेगा, और जिस प्रकार से आज आवारा कुत्‍ते घूमते रहते हैं और गली मुहल्‍लों में किसी को भी काट खाते हैं, उसी प्रकार से ये पशु भी सडकों पर निर्बाध भ्रमण करेंगे, यहां वहां अपने भोजन की व्‍यवस्‍था हेतु कूडेदानों में मुंह मारेंगे, यातायात व्‍यवस्‍था को बाधित करेंगे, मनुष्‍यों पर आक्रमण आरम्‍भ करेंगे, भूलिए मत तब आप अपने छोटे बच्‍चों को पार्क में खेलने न भेज सकेंगे, इसके अलावा भी बहुत कुछ होगा, चमडे की तस्‍करी आरम्‍भ होगी, उसके माफिया बनेंगे, अवैध तरीके से पशुओं की हत्‍यायें होंगी और स्‍मगलिंग भी शुरू होगी, जूतों के दाम जोकि अभी ही बहुत कम नहीं हैं, वे दस गुना तक बढ जाएंगे, बेल्‍ट के दाम भी इतने बढ जाएंगे कि कमर में रस्‍सी बांधना अधिक उपयुक्‍त प्रतीत होगा, अब बीफ तो मिलेगा नहीं, लिहाजा न बकरे की खैर रहेगी न उसकी मां की, उसके भी दाम इतने बढेंगे कि यह एक विलासिता का भोजन बन कर रह जाएगा, अब लोगों के शौक तो जाने से रहे, लिहाजा आयात बढेगा और व्‍यापार असंतुलन की स्थिति भी उत्‍पन्‍न होगी..
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बहरहाल इतना होकर भी एक बात तो बचेगी, धर्म तो बचा रहेगा ना.. आप तैयार हैं ना इस मूल्‍य पर धर्म की रक्षा के लिए तो शौक से कीजिए लेकिन क्षमा कीजिए, दोहरे मापदंड अपनाना छोड दीजिए, अब जब घर में विवाह हो तो कृपया ढोल मत बजाइये, चमडे का बना होता है, शायद गाय के चमडे का ही हो, धर्म की हानि नहीं होनी चाहिए, धर्म की जय हो ...
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(मनोज)    

Sunday, 18 January 2015

समरसिद्धा - एक रोचक गाथा



भाई सन्‍दीप नैय्यर की पुस्‍तक समरसिद्धा लगभग दो माह पूर्व मुझे मिली थी, पुस्‍तक पढने में समय लगा, क्षमा प्रार्थी हूं, परन्‍तु मैं जल्‍दबाजी में पढकर न तो उसके भावों की अवहेलना कर सकता था न ही शीघ्र इस रोचक रस से विमुख होना चाहता था, पुस्‍तक मिलते ही मैंने उसके कुछ पृष्‍ठ पढे, असत्‍य नहीं कहूंगा, मुझे इस पुस्‍तक की भाषा शैली के कारण राहुल सांकृतायन की याद आ गई, उनकी पुस्‍तक वोल्‍गा से गंगा तक की कुछ कहानियों से इस पुस्‍तक की भाषा शैली बेहद निकट है, उपन्‍यास की कथा आठवी शताब्‍दी ईसापूर्व से ली गई इै, इसमें एक प्रवाह के साथ-साथ उस समय के समाज की वर्ण व्‍यवस्‍था पर, उच्‍च तथा निम्‍न जातियों के मध्‍य विभेद पर सशक्‍त प्रहार करने का उपक्रम भी है, कहना अनुचित न होगा, कि यह विभेद काल के भेद को वेधते हुए आज भी हमारे समाज में कहीं न कहीं विद्यमान अवश्‍य है अतः पाठक को झकझोरती है, उसे उद्देलित करती है तथा चिंतन हेतु विवश भी करती है,
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शत्‍वरी एक नवयौवना गुंजन नामक एक शूद्र को संगीत की शिक्षा दिलवाती है, जोकि उस पर भारी पडती है, इसी के कारण उसे समाज द्वारा अनेक प्रकार से अपमानित, दंडित तथा बहिष्‍कृत किया जाता है और फिर उसके प्रतिशोध लेने की गाथा अपने आप में अनूठी है, लेकिन उसके सशस्‍त्र विद्रोह को उसके स्‍वयं के पुत्र का समर्थन प्राप्‍त नहीं होता, परन्‍तु फिर शत्‍वरी का पुत्र प्रेम, उसका अनुराग उसे समाज को उस रूप में परिवर्तित करने में सफल रहता है जिसकी सभी को आकांक्षा होती है, लेकिन रूकिए कथा इतनी भी सीधी व सरल नहीं इसमें मेकल नरेश नील और उसके सेनापाति धनंजय का गुप्‍तचर बनकर कोसल जाना, वहां की संस्‍कृति के बारे जानने समझने की चेष्‍टा तथा फिर उनके अत्‍याचारों से मुक्ति प्रदान करवाने की भी एक अलग कथा है, उपन्‍यास में दो कथाएं एक साथ चलती है जो बाद मे जाकर मिल जाती हैं, परन्‍तु यहां दो बाते बडी अटपटी सी लगती हैं, एक तो राजा और सेनापति का दूसरे राज्‍य में गुप्‍तचर बनकर जाना, जोकि कहीं से भी तार्किक नहीं लगता तो दूसरा यह कि समानान्‍तर चल रहे घटनाक्रम में अचानक ही एक कथा अट्ठारह बीस साल आगे बढ जाती है, और उसके बाद अंतत’ किसी भी कालखंड मे गणिका को पत्‍नी के समकक्ष खडा करना गले के नीचे सरलता से तो नहीं उतरता, हालांकि कथा में नैतिकता की तलाश करना उचित नहीं कहा जा सकता है,
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परन्‍तु इसके अतिरिक्‍त उपन्‍यास के कुछ अंश पढते-पढते ही यह पाठक को वाह वाह करने पर विवश कर देती हैं, जैसे रसों की और प्रमुखता से श्रंगार रस की व्‍याख्‍या लेखक ने कुछ इस प्रकार से की है कि पाठक अनायास ही स्‍वयं को उस रस में डूबता हुआ सा महसूस करने लगता है, इसी प्रकार से प्रेम में निष्‍ठा के महत्‍व को समझाते हुए गुजन के माध्‍यम से लेखक ने अपने सम्‍पूर्ण कौशल का सफलता पूर्वक प्रयोग किया है, ऐसे अनेक अवसर आए जहां किसी एक पृष्‍ठ को बार-बार पढकर आनंदित हुआ जा सकता है, परन्‍तु यह कहते हुए भी मुझे यह कहना होगा कि यदि यही श्रेष्‍ठ शैली सम्‍पूर्ण पुस्‍तक में समाहित की गई होती तो सम्‍भवतः यह पुस्‍तक और अधिक प्रभावी बन पडती, लेकिन यहां भी एक लेकिन था, यदि इसी शैली की निरंतरता रखी जाती तो सम्‍भवतः यह आमजन के लिए दुरूह हो सकती थी, और समझने के लिए भाषाविद की आवश्‍यक्‍ता को जन्‍म देती, अतः जो है वह उचित ही है,
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अन्‍ततः मित्रों मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि उपन्‍यास अत्‍यंत ही रोचक है, कथा पाठक को बांधकर रखती है, सामाजिक विभेद पर सटीकता से प्रहार करती है तथा पाठक को अपने आप से जोडकर रखती है, कहीं न कहीं पाठक कभी-कभी स्‍वयं को कथा का पात्रों के निकट पाता है, यह उपन्‍यास की सबसे बडी उपलब्धि है, परन्‍तु इतना सब कहते हुए फिर एक बात और पुस्‍तक में जो बात अटपटी लगती है वह यह कि इसमें न तो लेखक का चित्र है न ही विस्‍तृत जीवन वृत, और तो और इसमें लेख का कोई सम्‍पर्क सूत्र भी नहीं है, अच्‍छे प्रकाशक का यह आचरण अत्‍यंत ही विस्‍मयजनक है, लेखक को उसके हिस्‍से का स्‍थान मिलना ही चाहिए, परन्‍तु इससे इतर आप इस पुस्‍तक को अवश्‍य पढिए, निराश नहीं होंगे,
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(मनोज) 

Sunday, 4 January 2015

अभी अभी सपना टूटा है !!


नहीं कहो कुछ, कुछ मत बोलो
कोई अपना ज्‍यों रूठा है,
अभी अभी सपना टूटा है...



एक सुनहरी सी आभा थी,
एक मधुर सी छवि चित्रित की,
अभी तो था आकाश सजाया,
लगा ज्‍यों नव जीवन ने गति ली.
क्षण भर में सम्‍मोहन बिखरा,
मन फिर बोला
स्‍वप्‍न पराया जग झूठा है.
नहीं कहो कुछ, कुछ मत बोलो
अभी अभी सपना टूटा है...



हम थे दौडे, हम थे भागे,
कभी कभी खुद से भी आगे,
दुख था सुख था, हम स्थिर पर,
पलकों में संसार बसा के.
एक ही झटके में फिर किसने
इस हृदय के स्‍पंदन को,
आ लूटा है ?
नहीं कहो कुछ, कुछ मत बोलो,
अभी अभी सपना टूटा है...


अलसाई आंखों में अब भी,
वही झलक है वही कसक है,
वहीं पे खो जाने को आकुल,
मन की इच्‍छा भी भरसक है.
आधे अधूरे स्‍मृत विस्‍मृत करते झंकृत
आशाओं के बोझ तले,
अम्‍बर फूटा है.
नहीं कहो कुछ, कुछ मत बोलो,
अभी अभी सपना टूटा है...


नहीं रुकूंगा, नहीं चुकूंगा,
चुप भी नहीं हरगिज बैठूंगा,
पुनः उठूंगा, पुनः लडूंगा,
स्‍वप्‍न जहां पर फिर पहुंचूंगा |
गर पाषाण भी है पिघलेगा, बोल पडेगा
अभी भी एक सवेरा सम्‍मुख,
कोई नहीं मुझसे रूठा है |
आज नहीं कल पूर्ण पर होगा,
स्‍वप्‍न आज का जो टूटा है ||

(मनोज) 

Monday, 22 December 2014

धर्मान्तरण में क्या अनुचित !



मित्रों, धर्म एक ऐसाविषय है जो सदैव ही आध्‍यात्‍म तथा चिन्तन का माध्‍यम रहा है | परन्‍तु आज तो यह चिन्‍ता और चर्चा का केन्द्र अधिक बना हुआ प्रतीत होता है, लगता है मा‍नो कि यह धर्म ही समस्त समस्याओं की जननी है ! और यही विभेद का कारक बनी हुई है, आज सरकार और समाज मात्र इसी चिंता में लिप्‍त है कि धर्मांतरण अथवा घरवापसी जैसे विषयों की आवश्‍यकता क्‍या सचमुच है ?
  
अच्छा जरा सोचिए तो कि जब दि काल में मनुष्य का उद्भव हुआ होगा, तब वह किस धर्म का था ? किसी धर्म का नहीं ना, सम्भवतः उस समय धर्म जैसी कोई चीज थी ही नहीं, ठीक उसी प्रकार से आज भी मानव इस संसार मेंबिना किसी धर्म विशेष के ही जन्म लेता है, परन्तु जन्मते ही उसे किसी किसी धर्मविशेष द्वारा आच्छादित कर दिया जाता है, और हाल यह है कि आज कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा, ​जिसका कोई धर्म हो, तो भला ऐसा कैसे हो सकता है ? प्रकृति प्रदत्त मौलिक रूप, मौलिक अस्तित्व को विलोपित कर यह रूपान्तरण आखिर किसने किया और क्योंकिया होगा, यह सोचने का विषय है !

अच्छा फिर धर्म की उपयोगिता क्या है और धर्म की आवश्यक्ता क्यूं ? मेरे अनुसार धर्म को दो प्रकार से समझा जा सकता है, एक धर्म वह है जो हमें हमारे जीवन में कर्तव्यों की अनुभूति करवाता है, जैसे हमारा अपने माता पिता के प्रति धर्म, गुरूओं के प्रति धर्म, समाज के प्रति धर्म, मित्र के प्रति धर्म और शत्रु के प्रति भी धर्म, इस प्रकार का धर्म वस्तुतः कर्तव्योँ का ही ​​निर्धारणकर्ता है, संक्षेप में कहें तो हमेंकिस प्रकार से आहार, ​विहार, आचरण, विचरण करना है यह उसकीशिक्षा तथा प्रेरणा प्रदान करता है, यह जीवन जीने के क्रम हमारे व्‍यवहार को परिभाषित करता है,

धर्म का दूसरा स्वरूप पूजा पद्यति को रेखांकित करता है, पूजा अथवा ईश्वर की आराधना, जिसके उद्देश्यभिन्न हो सकते है, एक प्रकार की आराधना का उद्देश्य अपने सांसारिक जीवन में सुख तथा शांति की तलाश के साथ साथ कई बार ऐसी अपेक्षा भी होती हैकि अपने ईश्वर की आराधना से तथा उनके माध्‍यम से वह अपने इच्छित फलों की प्राप्ति कर ले, यथा यदि रोगी है तो निरोगी हो जाए, विपन्‍न है तो सम्‍पन्‍न हो सके आदि आदि, तो पूजा पद्यति का दूसरा प्रकार मृत्यु के पश्चात के काल के प्रति संशय से जन्मी अनिश्चितता की उपज है, मनुष्‍यों के पास स्वर्ग तथा  नर्क की अवधारणा है तो पुनर्जन्म जैसी व्याख्यायें भी हैं जो उसे धर्मोन्मुख करती है, ये ईश्वर का भय व्यक्ति के भीतर व्याप्त करती हैं, ऐसे में व्य​​क्ति ईश्वर की आराधना से अपने मृत्योपरान्त काल के सुख की कल्पना करता है, वह स्‍वर्ग की कामना करता है तथा ईश्‍वर से मोक्ष की अपेक्षा भी पालता है, (यह बात और है ​​कि मेरी मान्यता है ​​कि स्वर्ग, नर्क तथा पुनर्जन्म जैसी अवधारणाएं मनुष्यों में नैतिक मूल्यों के समावेश हेतु समाज में समाविष्‍ट की गई हैं,)

अब उक्‍त उद्देश्‍यों के परिप्रेक्ष्‍य में धर्म के परिवर्तन का विषय नितान्त ही व्‍यक्तिगत प्रतीत होता है, यदि कोई व्यक्ति ऐसा मानता है उसकी जीवन पद्दति, उसका धर्म तथा उस धर्म के नियम, उपदेश, दर्शनावली इत्यादि उसकी अपनी मान्यताओं के अनुरूप नहीं है तथा वह अपने कर्तव्यों का निर्वहनकिसी अन्य धर्म की मान्यताओं को  अपनाकर अधिक श्रेष्ठ प्रकार से कर सकता है तो ऐसे में उसके द्वारा धर्म परिवर्तन में भला क्या अनुचित है ? इसके अतिरिक्‍त यदि किसी व्यक्ति को ऐसा भी लगता हैकि उसे स्वयं के धर्म के अतिरिक्तकिसी अन्य धर्म की पूजा पद्दति को अपनाने से अधिक सुख, संतोष तथा शांति प्राप्त हो रही है अथवा हो सकती है तोफिर उसके किसी अन्य धर्म की पूजा पद्द​​ति को अपनाने में ​​​किसी को भी आपत्ति क्यूं होनी चाहिए ? ठीक इसी प्रकार दि कोई व्यक्ति यह मानता हैकि ईश्वर को प्राप्ति का उसका मार्ग उस मार्ग से भिन्न है, ​जिस पर वह जा रहा है, और उसे ऐसा विश्‍वास हो जाता है कि मृत्योपरान्त उसे किसी अन्य धर्म की अनुपालना में सद्गति, मोक्ष, स्वर्ग इत्यादि प्राप्त हो सकता है तो उसे उस उपाय को अपनाने से रोकने का भला क्या औचित्‍य बनता है, यह तो कोई समझाए ? हां यह समझा जा सकता है कि जिस धर्म में वह वर्तमान में है, उस धर्म के दिग्‍दर्शक, उसके कर्ता धर्ता अपनी बातें, अपने धर्म का व्‍याख्‍यान, उसकी शिक्षाएं उसे समझाने का यत्न करें, करना भी चाहिए, परन्तु दि फिर भी वह व्‍यक्त्‍िा सन्तुष्ट होता हो (अथवा  उससे  पूर्व भी) तो आप ही कहिएकि उसे भला कैसे और क्यूं रोका जाना चाहिए ? और ऐसा अधिकार किसी को क्‍यों प्राप्‍त होना चाहिए, जो किसी सामान्‍य व्‍यक्ति के सामान्‍य सी जीवन पद्दति में विघ्‍न डालता हो ?

अब इन्‍हीं बातों में कई बार एक और तथ्य उभर कर सामने जाता है, प्रायः ऐसा कहा जाता हैकि कुछ धर्मों के लोग अन्य धर्मावलंबियों को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर, धन देकर एवं अन्य प्रकार की सुख सुविधाएं प्रदान करके अथवा उसका आश्वासन देकर अपने धर्म की ओर आकर्षित करते हैं, और धर्मान्‍तरण करवा रहे हैं | मुझे लगता हैकि दि कोई व्यक्ति प्रलोभन प्राप्त करके भी अपना धर्म परिवर्तित करता है, तो इसमें अनुचित क्या है, दिकिसी धर्म को अपनाने से लौकिक सुखों की प्राप्ति की जा सकती है और दि किसी व्यक्ति का ध्येय वही है तो उसे उस धर्म को निश्चित रूप से अपना लेना चाहिए, वरन मैं तो कहूंगा ​​कि यह प्रलोभन एक प्रकार से प्रतियोगात्मक होनी चाहिए, वह इस प्रकार से ​​कि यदि अमुक धर्म के मतावलंबियों को कुछ अधिक सुविधाएं मिल रही है, उनका जीवन स्तर अधिक अच्छा है, तो दूसरे धर्म के संचालक, आचार्य, दिग्‍दर्शक अपने धर्मों मे भी तद्नुसार सुधार करें तथा उसे उन्नत बनाएं, वे अपने धर्म में अपेक्षाकृत अधिक सुविधाएं प्रदान करें, ताकि व्‍यक्ति उनके धर्म के प्रति आकर्षित हो सके, उदाहरणतः ऐसा हो सकता हैकि वे अपने हस्पताल खोले और अपने धर्मावलंबियों को निःशुल्‍क चिकित्सा सुविधा प्रदान करें, उनके लिए सामान्य तथा उच्चशिक्षा हेतु विद्यालय खोलें, जिसमें निःशुल्‍क शिक्षा प्रदान की जाए, ​​दि ऐसा हो सके तो यह एक स्वस्थ प्रतियोगिता होगी और ऐसे में किसी के धर्म परिवर्तन पर किसी को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए, यदि लोगों को अपने धर्म में ही रोकना है अथवा अपने साथ मिलाना है तो अपने धर्म को उन्‍नत करो, साधारण और सरल |

इसे किसी सेवा क्षेत्र की कम्पनी के उदाहरण द्वारा अधिक सरलता से समझा जा सकता है, देश में बैंकिंग तथा दूरसंचार कम्पनियां हैं जो सेवा प्रदान करने में एक दूसरे से प्रतिस्‍पर्धा करती हैं, ऐसे में जब कोई व्‍यक्ति अपने बैंक अथवा दूरसंचार कम्पनी को छोड़कर किसी अन्य संस्‍थान की सेवा लेता है, उसके साथ अपना संचालन आरम्‍भ कर लेता है तब इसे सहजता तथा सामान्य भाव सेलिया जाता है, सब स्‍वतः ही समझ जाते हैं कि अधिक सुविधाओं की खोज में उसने अपने सेवाप्रदान कर्ता को परिवर्तित कर लिया है, वस्तुतः देखा जाए तो किसी इस प्रकार की कम्पनी की सेवाओं तथा धर्म की विविधताओं में कोई विभिन्‍नता नहीं वरन अनेकानेक समानताएं है, जिस प्रकार से किसी क्षेत्र विशेष में कार्यरत सभी कम्पनियां लगभग एक प्रकार की सेवा प्रदान करती है, उसी प्रकार से सभी धर्मों कीशिक्षाओं तथा मान्‍यताओं में मात्र सूक्ष्म विभेद ही व्‍याप्‍त है,

अतः उक्त के परिप्रेक्ष्य में धर्मान्तरण, जिसे एक बड़ा मुद्दा तथा युद्ध का कारक माना जाता है, वह तो यह सहज, सरल व सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए | यह एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न होना चाहिए, जिसमेंकिसी का हस्तक्षेप अनावश्यक, अनापेक्षित तथा अस्वीकार्य होना चाहिए | धर्मान्तरण किसी समारोह इत्यादि का विषय होना ही नहीं चाहिए | वैसे तो इसकी आवश्यक्ता नहीं परन्तु दि आवश्यक हो तो धर्मान्तरण के पंजीकरण की व्यवस्था भी शुरू की जा सकती है, ​जिससे किसी प्रकार के संशय का भी समाधान हो सके | मित्रों, आज आवश्यक हैकि समाज जागरूक हो और इस प्रकार के अनावश्यक प्रलापों में अपना धन, समय तथा ऊर्जा नष्ट करते हुए रचनात्मक कार्यों में अपनी ऊर्जा लगाए तथा व्‍यक्तिगत विषयों को व्‍यक्त्‍िा तक ही रहने दे, राजनीति के लिए कई अनेक विषय और भी हैं ना...   


मनोज कुमार श्रीवास्तव