Saturday, 30 August 2014

मेरा खाता - भाग्‍य विधाता

मित्रों, कभी कभी मेरे मन में एक प्रश्न उठता है कि क्या एक बैंक खाता किसी गरीब की समस्यााओं को सुलझा सकता है ? और जवाब ढूंढने पर मेरे मन में ही जो जवाब सूझता है, वह है नहीं !!! संभवतः एक बैंक खाता किसी गरीब का कुछ खास भला नहीं कर सकता,

परन्तु क्या एक बैंक खाता किसी व्‍यक्ति को कुछ आत्मविश्वास प्रदान कर सकता है ? क्या‍ एक बैंक खाता किसी व्‍यक्ति को कुछ वित्ती‍य समझ प्रदान कर सकता है ? क्या वह किसी व्‍यक्त्‍िा में बचत की उन आदतो को बढावा दे सकता है ? जो उसके वक्त जरूरत काम आ सके, तो जवाब यकीनन हॉ ही होगा.

अब यदि इस खाते के माध्यम से आवश्यक्ता पडने पर एक छोटी राशि ही सही, परन्तु कुछ अधिविकर्ष (ओवरड्राफ्ट) की सुविधा मिल जाए तो, और उसके बाद फिर यदि इसमें दुर्घटना बीमा जैसे शब्द जोड दिए जाएं, जिससे कि किसी परिवार के किसी सदस्य की यदि अकस्मात मृत्यु हो जाए अथवा वह किसी दुर्घटना का शिकार हो जाए तो पीडित परिवार को एक लाख रूपये मिल सकें, तो कैसा होगा ? मित्रों, वह एक लाख रूपये घर के मृत सदस्य को तो वापस नहीं ला सकते, परन्तु उस परिवार को एक आर्थिक पुर्नजीवन प्रदान करने में यह एक लाख रूपये अवश्य सक्षम हो सकते हैं, जिसके लिए आप भागीदार होने जा रहेे हैं, मित्रों, कदाचित उस एक लाख रूपये का मूल्य वह गरीब ही बेहतर समझ सकता है, जिसके ऊपर वह विपत्ति आन पडी हो, और यदि इतना कुछ होता हो तो यही खाता किसी गरीब के लिए एक सार्थक सम्बल बन कर खडा हो जाता है, अतः आज जबकि देश के प्रधानमंत्री ने धन जन योजना के माध्यम से देश के सभी गरीबों को इससे जोडने की योजना बनाई है, तो यह हम सभी का दायित्व बन जाता है कि हम उस आह्वान को सकारात्मक ढंग से लें और अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ इस खाते के माध्यम से जोडें,

हां मैं मानता हूं कि समस्याएं हैं, बैंको के भीतर स्वतः कई प्रकार की समस्याएं विद्यमान हैं, शाखाओं में कर्मचारियों की संख्या कम है, कई जगहों पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, बैंक के कार्यकाल के अतिरिक्त भी समय निवेशित करना पड रहा है, परन्तु यकीन जानिए यह सब कुछ किसी गरीब की तकलीफों से अधिक कुछ भी नहीं है, जब किसी पीडित परिवार को एक लाख रूपये का चेक प्राप्‍त होगा तब आज की ये सभी तकलीफें आपको गर्व करने का अवसर प्रदान करेंगी,

मित्रों, जब श्रीमति गांधी ने देश के बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था, तो उसके पीछे की मूल भावना भी लाभप्रदता नहीं, सामाजिक कल्याण की ही थी और यदि आज उस भावना को वर्तमान प्रधानमंत्री ने बल प्रदान किया है, तो यह हम सभी का नैतिक दायित्व् भी बन जाता है कि उस भाव को जीवंत कर सार्थकता प्रदान करें,
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(मनोज)

Sunday, 4 May 2014

धर्म क्‍या है ?



आज हमारे एक मित्र ने पूछा कि धर्म क्‍या है, तो सोचना पडा कि आखिर धर्म है क्‍या, मैंने मित्रों, अपनी पाठ्य पुस्‍तक में एक श्‍लोक पढा था, आपसे भी साझा किए लेता हूं –

नैव राज्‍यं न राजासीन्‍न, न दण्‍डो न दण्डिका
धमैणैव प्रजा सर्वां, रक्षंतिस्‍म परस्‍परम् |”

कथन का तात्‍पर्य यह कि एक समय ऐसा भी था, जब न तो कोई राजा था और न कोई प्रजा, न कोई कानून था और न ही कोई दंड देने वाला, ऐसे में धर्म के माध्‍यम से ही प्रजा एक दूसरे की रक्षा किया करती थी,

मित्रों, उक्‍त श्‍लोक में जिस धर्म की बात की जा रही है, वह है मानव धर्म. वही धर्म जो श्रेष्‍ठतम् माना जाता है. अब जरा सोचिए कि जब धरा पर मानव का उद्भव हुआ होगा, उस समय कौन सा धर्म था ? कोई नहीं ना !! तो फिर इस धर्म को बनाया किसने ? और इसका औचित्‍य क्‍या है ? क्‍या कारण है कि उस वक्‍त जिस बच्‍चे का जन्‍म हुआ था वह बिना किसी के धर्म के था जबकि आज बच्‍चा जन्‍म लेते ही एक धर्म विशेष से बंध जाता है, इसके जवाब की सोचें तो मेरे विचार से धर्म का विकास ज्ञान और उससे उपजी मतभिन्‍नता से हुआ है. जब मनुष्‍य का मस्तिष्‍क विकसित हो रहा था, तो उसने-अपने विचार बनाए, जिसे कुछ ने माना, कुछ ने नहीं. इन मान्‍यताओं के अपने प्रणेता थे, जिन्‍हें ईश्‍वर के समकक्ष और आराध्‍य माना गया. फिर मान्‍यताओं के आधार पर समूह निर्मित हुए, जिन्‍होंने अपने-अपने ग्रंथ बनाए, पूजा पद्दति विकसित की और अपने-अपने भगवान गढे, अब ये मान्‍यतायें उनके मन मस्तिष्‍क पर इतनी हावी हो गई कि वे विपरीत विचार सुनने को कत्‍तई तैयार नहीं थे, और इसी असहिष्‍णुता से विभिन्‍न धर्मों का उद्भव हुआ होगा,

अब प्रश्‍न उठता है कि इन धर्मो की सामाजिक जीवन में आवश्‍यक्‍ता क्‍या है ? और क्‍यों है ? तो मित्रों, सच तो यह है कि यदि धर्म पूर्ण रूप से अनावश्‍यक होता तो उसे कब का त्‍याग दिया गया होता, परन्‍तु ऐसा है नहीं, समाज में धर्म की अपनी आवश्‍यक्‍ता है, धर्म ने समाज के नियमों की संरचना की और उसी के आधार पर समाज का विकास और व्‍यवस्‍था का संचालन भी हुआ, नियमों को न मानने वालों को धर्म के आधार पर ही दंड की व्‍यवस्‍था भी की गई. धर्म ने लोगों को डराने का भी काम किया और यह विश्‍वास विकसित करने मे सफलता पाई कि धर्म को न मानने वाले अधार्मिकों को ईश्‍वर स्‍वयं दंड देता है, जिससे नैतिकता का भी विकास हुआ, इसके अतिरिक्‍त चूंकि जन्‍म से पूर्व और मृत्‍योपरान्‍त का सत्‍य अज्ञात है, अतः मैं कहूंगा कि धर्म ने उसे भी भुनाया, प्रत्‍येक धर्म ने अपने-अपने मतों के अनुसार मृत्‍योपरान्‍त के उस अज्ञात सच की न केवल अपने अनुसार व्‍याख्‍या की वरन लोगों के मन में उस व्‍याख्‍या को स्‍थापित भी किया. फलतः मृत्‍योपरांत स्‍थाई शांति जिसे मोक्ष की संज्ञा दी जाती है, कि तलाश भी धर्म के माध्‍यम से की जाती रही है.

यदि आज के समाज की बात करें तो आज का समाज दुःख, तकलीफों, गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्‍टाचार जैसी अनेक समस्‍याओं से जूझ रहा है. ऐसे में धर्म ही उन्‍हें जीने का हौसला देता है. उनमें आशा का संचार करता है. उन्‍हें विश्‍वास दिलाता है कि नहीं, यह सभी मुसीबतें स्‍थाई  नहीं है, कहीं न कहीं उनका ईश्‍वर है, जो आएगा और उन्‍हें उनकी तकलीफों से मुक्ति दिलाएगा. तो धर्म एक जीवनदायिनी शक्त्‍िा के रूप में विकसित हुई है, वह शक्त्‍िा जो लोगों के हृदय में विराजमान है.

परन्‍तु दूसरी तरफ आज इसका विध्‍वंसकारी रूप भी है, इसी धर्म के नाम पर समाज बंटा हुआ है, लोगों को ऐसा लगता है कि सिर्फ उसके धर्म/ सम्‍प्रदाय/ समाज का व्‍यक्ति ही उनका हित कर सकता है. अन्‍य कोई नहीं और आज की लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में इसी विभेद का लाभ उठाया जाता है, और बंटे हुए समाज को और बांटने का प्रबंध किया जाता है, और फिर यही विभेद अशांति और कलह का कारण बनता है. इसके अतिरिक्‍त अनेक स्‍वयंभू अपने अलग-अलग सम्‍प्रदाय निर्मित करने में लगे हैं, जिससे धर्म के नाम पर ठगी बढी है.

बहरहाल अंत में यही कहूंगा कि धर्म एक विश्‍वास है, एक दर्शन है, एक जीवनदायिनी शक्ति है, जिससे प्रेरणा पाकर यह समाज संचालित हो रहा है और आगे बढ रहा है बावजूद इसके कि इस विश्‍वास पर निरंतर प्रहार हो रहे है.




(मनोज) 

Tuesday, 22 April 2014

चलो चर्चाया जाए - 2

मित्रों, चुनाव अपने चरम पर है, लिहाजा उसके सतरंगी रूप भी रोज दिखाई दे रहे हैं, कुछ चेहरे जो कि अभी तक अस्‍पष्‍ट थे, अब थोडे स्‍पस्‍ट से दिखने लगे हैं, साथ ही प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर चल रहे कदम कुछ तेजी से बढने लगे हैं, मसला है कि चर्चा करें तो किस पर करें और किस पर न करें, चलिए आज चुनाव प्रचार के एक नए ढंग की चर्चा कर लेते है, वह जोकि मीडिया के माध्‍यम से होता है - 


मित्रों, पिछले कुछ दिनों में भाजपा का मीडिया में प्रचार के प्रारूप को देखिए, पहले 12 अप्रैल को आप की अदालत में मोदी आते हैं, यह था मोदी का चुनावों के मध्‍य दिया गया पहला इंटरव्‍यू, सटीक समय पर, खूब चर्चा हुई, इलेक्‍ट्रानिक व प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, फिर उसके बाद मोदी के समर्थन में उतरे राज ठाकरे, पहले अर्णव गोस्‍वामी के साथ और फिर पूरे मीडिया पर छा गए, ध्‍यान दीजिएगा 17 अप्रैल और 24 अप्रैल को महाराष्‍ट्र की 19, 19  सीटों पर मतदान था/है. अतः इन इंटरव्‍यूज का सीधा अभिप्राय चुनाव प्रचार और मोदी जी को महाराष्‍ट्र में लाभ पहुचाना ही था,
इस बात को भी ध्‍यान में रखना होगा कि भाजपा का महाराष्‍ट्र में गठबंधन शिवसेना के साथ है, मनसे के साथ नहीं, चुनाव से पहले, मोदीगान, भाजपा की गडकरी नीति है, जिन्‍होंने मनसे को चुनाव में साथ देने के लिए मनाया हुआ है,


अब सोचिए कि मोदी जी का नामांकन 24 अप्रैल को ही क्‍यों रखा गया है, जबकि पंडित गण भी तिथि के सम्‍बंध में भ्रमित हैं, तो भाइयों भूल गए क्‍या 24 अप्रैल को छठे चरण में 117 सीटों पर मतदान होना है, और इस दिन सारा मोदी का नामांकन होने से सारा मीडिया मोदीमय होगा, लोग टी.वी. देखे बिना तो रह नहीं सकते लिहाजा, नामांकन तो करना ही था, और प्रचार मुफ्त........ तो इसे कहते हैं, प्रचार की सही तकनीकि, अभी मोदी के इंटरव्‍यू हर चैनल पर छाए हुए हैं, कारण प्रचार, अब सोचिए वे इतने दिनों से प्रचार कर रहे हैं, पहले इंटरव्‍यू क्‍यों नहीं दिया था, डरते थे क्‍या, नहीं भाई, इसका तो सरल सा जवाब है, अापकी प्‍यास बढा रहे थे, ताकि अब जब ऐन मतदान के समय इंटरव्‍यू आए तो वह ताजातरीन हो और आप उसे देखने को विवश हों ......... अब आप कहेंगे कि यह विचार कुछ नया है क्‍या. तो मैं कहूंगा नहीं .... श्रीमान आधुनिक गांधी के प्रमुख क्षेत्र का चुनाव पहले था, लिहाजा वे बाजी मार चुके हैं, याद नहीं आ रहा ....तो हम याद दिलाए देते हैं ... 


याद कीजिए, दिल्‍ली में मतदान के दो दिनों पूर्व कैसा स्‍वांग रचाया गया था, वह टैक्‍सी वाला भी भूल गया आप को, वह राजघाट पर बैठे आधुनिक गांधी .... याद आया ना......आ ही गया होगा, तो मित्रों, सत्‍य तो यह है कि वह प्रचार का ही एक जरिया था, चुनाव प्रचार रूक जाने के पश्‍चात मीडिया में किया जाने वाला प्रचार, उन्‍हें मीडिया स्‍पेस मिला भी, परन्‍तु चूंकि वे पहले ही अनेक बार इस तरह के नाटक कर चुके हैं, लिहाजा मतदाताओं ने उन्‍हें कितनी गम्‍भीरता से लिया होगा, वह तो 16 दिसम्‍बर को ही पता चलेगा,
       
अब देखिए, हम गिरिराज के फिसलने पर ही अटके हैं, और जोशी जैसे विद्वान की असंयतता, उनकी प्रतिस्‍पर्धा, उनकी प्रतिद्वंदिता जो वैमनस्‍यता पर जाकर ठहरती लगती है, अभी तक उसी पर टिके पडे हैं, जी न्‍यूज से इंटरव्‍यू डिलीट तो किया पर प्रोफेसर साहेब यह भूल गए कि कैमरे दो थे, बहरहाल चुनाव है, चलता रहता है, आधुनिक गांधी को क्‍या बुरा मानना अगर मोहतरमा शाजिया जी की कम्‍यूनल जुबान भी थोडी फिसल ही गई तो ....
                                                                                                                                                         मनोज

Friday, 11 April 2014

चलो चर्चाया जाए - 1

मित्रों, आज टी.वी. पर चर्चा के एक दो ही विषय है, लगता है देश के सभी मुद्दे आज गौण हो चले हैं, एक तरफ सिर्फ और सिर्फ श्रीमान मोदी जी की पत्‍नी की चर्चा है, तो दूसरी तरफ एक चर्चा और चल रही है, वह यह कि एक श्रीमान सेकुलर और एक श्रीमान कम्‍युनल दोनों पर एक साथ रैली, भाषण और रोड शो पर रोक लगा दी गई है, आइए इसके निहितार्थ तलाशने का यत्‍न करते हैं,

मित्रों, जहां तक चुनावी प्रचार व भाषणों पर प्रतिबंध का प्रश्‍न है, मेरे विचार से यह उचित ही है, अनुचित प्रलाप करने वाले भाषणकर्ता पर रोक उचित है, परन्‍तु यह रोक चयनित है, मसलन सहारनपुर के कांग्रेस प्रत्‍याशी पर प्रतिबंध क्‍यों नहीं लगाया गया था, अनर्गल प्रलाप रोज ही करने वाले महान बेनी बाबू पर क्‍यों नहीं लगाया गया, मुलायम सिंह पर क्‍यों नहीं लगाया गया, और तो और अपनी बेतुकी बातों से जायका बिगाडने वाले, ओसामा जी के प्रिय दिग्विजय सिंह पर क्‍यों नहीं लगाया गया, कारण राजनीतिक दिखते हैं, अब देखिए, श्रीमान आजम खान का बयान घोर निंदनीय था, किसी भी सभ्‍य समाज में सैन्‍य बलों को धार्मिक आधार पर देखा समझाा जाना अकल्‍पनीय व आत्‍मघाती है, परन्‍तु ऐसे में चुनाव आयोग निष्‍पक्ष दिख सके इसलिए अमित शाह पर भी प्रतिबंध लगाना आवश्‍यक था, भाई समन्‍वय भी भला कोई चीज होती है, और निष्‍पक्ष दिखना भी चुनावों में उतना ही जरूरी होता है, जैसा कि चुनाव आयोग ने दिखाया, तो उचित है,
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मित्रों, अब एक दूसरी बात, श्रीमान ए.के.49 ने कहा कि वे मोदी और राहुल को हराने के लिए किसी का भी समर्थन लेने को तैयार है, ध्‍यान देने योग्‍य बात यह कि अभी तक श्रीमान अंसारी ने अपना समर्थन दिल्‍ली के पूर्व मुख्‍यमंत्री को देने की बात की नहीं है, तो इस उतावलेपन को क्‍या कहा जाना चाहिए, क्‍या इससे भ्रष्‍टाचार के विरूद्ध आप की लडाई को बल मिलेगा, परन्‍तु गंभीर अपराध के आरोपियों का सहयोग लेकर वे किस पर विजय प्राप्‍त करना चाहते हैं, कौन से भ्रष्‍टाचार का आरोप है मोदी जी पर, यह तो पता नहीं, परन्‍तु सत्‍य यह है कि ये श्रीमन अपनी कुठित इच्‍छाओं की तुष्टि चाहते हैं, भले ही उसकी कीमत कुछ भी देनी पडे, किसी को भी देनी पडे, जन को अथवा जनतंत्र को .... बहरहाल, वे अपनी दुर्भावना में सफल होंगे, इसकी संभावना नहीं दिख रही,
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और अब सबसे अहम् बात, मित्रों, प्रेम एक छोटा सा शब्‍द है, परन्‍तु इसका विस्‍तार अनन्‍त है, प्रेम में सदैव ही कुछ प्राप्‍त होगा, ऐसा नहीं होता, प्रेम तो एक समर्पण है, विश्‍वास है, निष्‍ठा है, हृदय में प्रवाह होता एक अनन्‍य भाव है, प्रेम के कई रूप है, मीरा का प्रेम है, तो सीता का भी प्रेम है, उर्मिला का प्रेम है तो भरत का भी प्रेम है, और यह अनन्‍त गाथा है, इसी गााथा में जसोदा बेन भी आती है, प्रेम का यह एक असाधाराण रूप है, जो व्‍यक्ति को दिव्‍य बनाता है, तेजवंत करता है और उसे इतिहास के पन्‍नों में सदैव के लिए जीवंत कर देता है, मित्रों, बिरले लोग ही ऐसे सौभाग्‍यशाली होते हैं, जिन्‍हें जीवन में इस वास्‍तविक प्रेम की प्राप्ति होती है, प्रेम के इस रूप की भी स्‍तुति होनी चाहिए, न की आलोचना और उपेक्षा ..... बहरहाल, टी.वी स्‍टूडियों में वोट तलाशते लोग इसे समझने का क्‍यों यत्‍न करने लगे, उन्‍हें जो रस चाहिए वह यहां नहीं, यह वह प्रेम नहीं, जो उन्‍हें तुष्‍ट करता है, वे अपने भावार्थ समझने में व्‍य‍स्‍त हैं,
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वैसे आपको क्‍या, आप तो अपने राष्‍ट्र प्रेम की बात करिए, और यही कहिए .........
अबकी बार .....................


(मनोज)

Friday, 15 November 2013

हुत्त ... हम नहीं जाएंगे वोट डारने ....




भैय्या अब हमारी तो किस्‍मत ही खराब है, सोचा था सरकार बनेगी, सरकार बदलेगी तो हमारी भी कुछ दशा बदलेगी, लेकिन अब तो ये हौसला भी जाता रहा, देश के प्रमुख विपक्षी दल ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के बारे में घोषणा कर दी है, नरेंद्र मोदी !!! अब सोचिए मोदी जी हमारी परेशानी कैसे समझ सकते हैं, सुना है वो चाय बेचा करते थे, तो हां होगी न गरीबी के बारे में जानकारी, होगी न उनकी चिन्‍ता, लेकिन हमारा क्‍या, वैसे वह गुजरात के बारह साल से अधिक से मुख्‍यमंत्री हैं, परन्‍तु उनका चिंतन बिल्‍कुल उनकी तरह का ही है, बोलते हैं कि पूरे देश को गुजरात बना देंगे, बोले तो कहीं दारू नहीं मिलेगी, अमा लानत है आने वाली ऐसी सरकार पर, जो गम गलत करने पर भी पाबंदी लगाती हो, तो फिर वे हमारा दुःख समझ ही नहीं सकते हैं तो दूर करने की तो बात ही दूर !!


तो दूसरी तरफ राहुल गांधी, आजकल जहां जाते हैं आक्रोश जाहिर करते नहीं अघाते, व्‍यवस्‍था बदल देंगे ! अला कर देंगे ! फलां कर देंगे ! मिंया हम तो सुन के ही घबरा जाते हैं, पहले ही हमारी व्‍यवस्‍था के चीथडे हो चुके हैं, अब हमारे ऊ चीथडे भी छीन लेंगे का, भैय्या कौन सी व्‍यवस्‍था बदलेंगे, वैसे तो शाही खानदान से ताल्‍लुक रखते हैं, त हम गरीबों को तो नहीं ही जानते होंगे, हां समझने की कोशिश सुना है कर रहे हैं, सुनते हैं गरीबों के घर जाके खाना खाते हैं, एक तो पहले ही राशन की किल्‍लत ऊपर से ये वी.आई.पी. मेहमान, तो  लाख कोशिश कर लो, मिंया हमारा दुखडा तो आप भी न जान पाओगे, आप भी न समझ पाओगे क्‍योंकि आपका मिजाज ही कुछ ऐसा है हम का करें,

अब हम परेशान हो रिए हैं, हलकान हुए जाते हैं, अपना वोट दें तो किसको दें, नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी तो हमारा दुख समझ नहीं सकते, बाकी पार्टियां तो हैं नहीं लेकिन हां यहां वहां सभी जगह मायावती जी ही अपने उम्‍मीदवार खडे करती हैं, लेकिन महिलाओं से तो हमारी रूह कांपती है, लिहाजा हमारा दुखडा उनसे भी अछूता ही है, वे भी नहीं समझ सकती कि आखिर हमारी समस्‍याओं से हमें निजात कैसे मिलेगी, फिर तो यही गाना याद आता है कि ...... जाएं तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां दर्द भरे दिल की जुबां, जाएं तो जाएं कहां ....

ओ तेरी, ये तो बताया ही नहीं कि हमारा दुखडा है का, तो भैय्या आप खुद ही समझ लीजिए कि किसी भी पुरूष या महापुरूष के समस्‍त कष्‍टों की जननी आखिर है कौन ? दिन भर दफ्तर में, खेत में, फैक्‍ट्री में खट के शाम को घर आने के बाद तकलीफ को बढा देने का काम भला कौन करती है ? कौन है जो वक्‍त बेवक्‍त आपको बाजार के चक्‍कर कटवाती है ? कौन है जो आपके हर काम में पलीता लगा देने पर आमादा रहती है ? कौन है जो दो प्रहर आपको चैन से जीने मरने नहीं देती ? अच्‍छा बताइए तो कि आखिर कौन है जो सुबह सबेरे आपसे घर में झाडू, फटका और बर्तन करवाती है ? कौन है जो आपके बटुए की सेंधमारी करती है और आप अगले दिन आटो वाले के सामने शर्मिंदा होने के बावजूद भी मन मसोस के रह जाते हैं !!! कौन है जो आपके बास से ज्‍यादा आप पर हावी होने का हुनर रखती है ? कौन है जो आपको तो छोडो, आपकी दो घूंट दारू भी बर्दाश्‍त नहीं कर पाती है ? मिंया, अब हमारी तो डर के मारे घिग्‍घी बंधी रहती है, इसलिए सीधे सीधे नाम भी नहीं ले सकते !! लिहाजा इशारों में ही बता रहे हैं, ई शादी जो है न भैय्या, अच्‍छे अच्‍छों की जन्‍नत को जलालत में तब्‍दील कर देती है, नहीं मानते तो अपने वर्तमान प्रधानमंत्री को ही देख लीजिए, शादी शुदा हैं, मुख श्री से वैसे तो कुछ बोलते नहीं और कभी कुछ बोलते भी हैं तो कैसे और कितना !!! बूझ रहे हैं ना, इनसे निराश थे इसीलिए चाह रहे थे कि कोई बेहतर आए जिसमें थोडी तो हिम्‍मत हो, और पतियों का पक्ष ले सके,   

लेकिन अब आप ही कहिए, जब मोदी जी ने, राहुल जी ने शादी की ही नहीं तो वे भला हमारे कष्‍टों कों कैसे समझ सकते हैं ? हमारी समस्‍याओं के बारे में ये न तो कोई कानून पास करवा सकते हैं और न ही कोई अध्‍यादेश ला सकते हैं !! हमारी हालत तो जस की तस बनी रहेगी, और फिर जो व्‍यक्ति देश की 90 फीसदी मतदाताओं की दुःख तकलीफें नहीं समझ सकता, उसे कहिए भला कैसे वोट मांगने का अधिकार है और क्‍यू सरकार बनाने दिया जाना चाहिए ???

लिहाजा हम तो अन्‍न ना बाबा की तरह अनशन करेंगे, कि भैय्या किसी शादीशुदा इंसान को प्रधानमंत्री बनाया जाए, ताकि वह हमारी दुःख तकलीफें समझ सके और उसे दूर करने की दिशा में कुछ काम कर सके, तो हम ना जाने वाले किसी को वोट देने, ऐसे लोगों को वोट दे के का फायदा अउर का कायदा जो हमारी भावनाएं ही ना समझता हो,

हुत्‍त त हम नहीं जाएंगे वोट डारने....


जय हो

    मनोज