Monday, 9 December 2013

"आप" की गंदी राजनीति...



मित्रों, आज के प्रचार तंत्र को मैं दंडवत नमन करता हूं ! जिसमे विधान सभा चुनावों में भाजपा की तीन राज्‍यों में हुई बडी जीत और चौथे राज्‍य में सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरने की बात को धता बताते हुए एक छोटे राज्‍य में दूसरे नंबर पर आई पार्टी आप की जीत को अभूतपूर्व और उसके पुरोधा को महानायक बनाने का भगीरथ प्रयास जारी है :) अचानक से ही मुझे सतयुग आने के आसार नजर आने लगे, यह जानते हुए भी कि "आप" सरकार नहीं बनाना चाहती और यह न जानते हुए भी कि सतयुग में कौन से महापुरूष अवतरित हुए थे, बहरहाल आज की राजनीति पर एक लघु चर्चा कर लेने में किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लिहाजा आज की परिस्थिति पर कुछ बात की जानी जरूरी है,

तो जैसा कि आपको विदित ही है दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में भाजपा को 32, आप को 28 और कांग्रेस को 8 सीटें मिलीं, भाजपा सरकार तो बनाना चाहती है परन्‍तु संख्‍या नहीं है, "आप" ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि न तो वे किसी का समर्थन लेंगे और न ही किसी को समर्थन देंगे, अर्थात वे किसी भी प्रकार से सरकार में सहभागिता करने को तैयार नहीं, कांग्रेस और भाजपा तो नदी के दो किनारे हैं, जिनका मिलना असंभव है ! तो ऐसे में जबकि भाजपा ने तोड फोड करने से इंकार कर दिया है (हालांकि मेरे विचार से ऐसा करने में कुछ भी गलत नहीं होता), तो प्रश्‍न उठता है कि भला सरकार बने तो कैसे बने ? "आप" की हठधर्मिता ने कुछ प्रश्‍नों को अनायास ही सम्‍मुख लाकर खडा कर दिया है, आइये देखते हैं –

1 - "आप" के मुखिया केजरीवाल ने स्‍पष्‍ट कह दिया है कि सरकार बनने की कोई सूरत नहीं है लिहाजा दोबारा चुनाव होते हैं तो हो जाएं हम उसके लिए तैयार है, उन्‍होंने अत्‍यंत ही साफगोई से कहा कि क्‍या हो जाएगा अगर चुनावों में 400-500 करोड रूपये खर्च हो जाएंगे तो ? कम से कम एक स्‍थाई सरकार तो आएगी, केजरीवाल ने 400-500 करोड ऐसे कहे, मानों ठेले वाले से फल खरीद लाने जैसी सरल सी बात हो :) अब जरा आप ही सोचिए कि इन 400-500 करोड को बोझ आखिर किसके मत्‍थे पडेगा, क्‍या उस जनता के सर नहीं, जिसके हिमायती होने का "आप" दंभ भरते हैं,

2 - चलिए माना कि स्‍थाई सरकार के नाम पर चार पांच सौ करोड राज्‍य की जनता ने सह भी लिया तो, इस बात की क्‍या गारंटी है कि दोबारा चुनाव हो जाने पर त्रिशंकु विधान सभा नहीं आएगी, और यदि पुनः त्रिशंकु विधान सभा ही आती है तो ये चार पांच सौ करोड कितनी बार खर्च किए जाएंगे ??

3 - यदि त्रिशंकु विधान सभा आने पर पुनः चुनावों में जाना ही एकमात्र विकल्‍प होगा तो फिर यही मापदंड संसद के लिए भी होना चाहिए और यदि ऐसा ही हो तो फिर यकीन जानिए कि कई वर्षों तक छः माह के लिए राष्‍ट्रपति शासन और फिर चुनाव, राष्‍ट्र में यही क्रम चलता रहेगा, क्‍या होगा, अर्थनीति, रक्षानीति और विदेशनीति का, तो फिर जिस प्रकार से देश की सरकार गठजोड से चलती है, उसी प्रकार का प्रयास राज्‍य में क्‍यों नहीं होना चाहिए? और यदि होना चाहिए तो "आप" को सहभागिता के लिए प्रयास क्‍यों नहीं करना चाहिए?

4 - इस बार चुने गए जिन विधायकों को पांच साल के लिए अपने क्षेत्र की जनता की सेवा के लिए चुना गया है, उन्‍हें दोबारा चुनाव में धकेल दिए जाने का दोष आप के और उसके  नेता के मत्‍थे क्‍यों नहीं मारा जाना चाहिए ?

5 - फिर एक लाख टके कि बात यह कि केजरीवाल चाहे तो चाहे क्‍या कोई भी विधायक दोबारा चुनाव लडना चाहेगा :) शायद नहीं, क्‍योंकि एक तो दोबारा जीत जाने की कोई गारंटी नहीं होगी दूसरी तरफ पैसे लगेंगे सो अलग, लिहाजा कोई भी विधायक इस दोहरे जोखिम का वहन करते हुए दोबारा चुनाव नहीं लडना चाहेगा, ऐसे में खुद आप के विधायक  मंत्रीपद के लिए भाजपा का साथ दे सकते हैं,  ऐसे में यदि सेवाभाव की भी बात करें तो वे मंत्री बनकर दिल्‍ली की जनता की सेवा सरलता से कर सकते हैं, कई बार मुझे लगता है कि स्‍वयं केजरीवाल जी भी ऐसा ही चाह सकते हैं, क्‍योंकि ऐसे में वे भाजपा को भ्रष्‍ट और खुद को शहीद दर्शाने का कोई मौका नहीं छोडेंगे, लेकिन लगता है भाजपा ने उनकी यह रणनीति भांप ली है लिहाजा उसने तोड फोड का खुद से ओर से प्रयास न करने का निर्णय लिया है.

तो मित्रों, सत्‍य तो यह है कि "आप" ने राज्‍य की भोली भाली जनता को झूठे दिवास्‍वप्‍न दिखाए, बिजली के दामों को आधा कर देना, 700 लीटर मुफ्त पानी देना, भ्रष्‍टाचार का समूल नाश करना और मंहगाई पूरी तरह से समाप्‍त कर देना जैसे लुभावने वादे बढ चढ कर किए गए, जिनके प्रलोभन में जनता उसी प्रकार से फंस गई जिस प्रकार से कुटिल संतों के शब्‍दों की बाजीगरी में उसे मोक्ष की प्राप्ति संभव लगती है, और सत्‍य सम्‍मुख आने पर वह खुद को ठगा हुआ सा महसूस करता है, इसी प्रकार से यहां भी सत्‍य तो यह है कि अनेकानेक वस्‍तुओं के दाम बाजार द्वारा ही नियंत्रित होते हैं और उनका मूल्‍य काफी कुछ उत्‍पादन व आयात निर्यात से जुडा हुआ होता है, ऐसे में मूल्‍यों में अत्‍यधिक कटौती करना किसी के बूते की बात नहीं और यह बात केजरीवाल जैसा चतुर व्‍यक्ति भली भांति जानता है, लिहाजा वह सत्‍ता में भागीदारी करने से बचना चाहते हैं, वे भाजपा के साथ जुडने से और जुडा हुआ दिखने से भी बचना चाहते हैं, अन्‍यथा यदि साफ सुथरी राजनीति की ही बात थी तो "आप", भाजपा से कहते कि आइए एक कामन मिनिमम प्रोग्राम बना लेते हैं, और उसके अनुसार जनता की सेवा करते हैं, जब भी मुख्‍यमंत्री कोई गलत कार्य करेगा तो अंकुश लगाया जाएगा और यदि अत्‍यधिक आवश्‍यक हुआ तो सरकार गिराने का विकल्‍प सदैव ही खुला हुआ है,

लेकिन नहीं वे ऐसा नहीं करेंगे क्‍योंकि उन्‍हें पता है कि प्रश्‍न उठाना सरल है, जवाबदेह होना और जिम्‍मेदारी लेना कहीं कठिन, तो वे सरल मार्ग अपनाते रहेगें, चाहे इसमें आम जनता की कुछ भी हानि होती रहे,


मनोज
 

10 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (10-12-2013) को मंगलवारीय चर्चा --1456 कमल से नहीं झाड़ू से पिटे हैं हम में "मयंक का कोना" पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आपकी सदाशयता के लिए हृदय से आभारी हूं शास्‍त्री जी

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  2. आपस में सब भाई भाई
    काहे को करनी लड़ाई
    मिल बाट कर करो कटाई
    खेत अपना किसने बोई
    फसल किसने की निराई
    कोई फर्क नहीं पड़ना भाई :)

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    1. हा हा हा, बिल्‍कुल सच कहा जोशी जी, आप भी इसी रास्‍ते पर अग्रसर है,

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  3. बहुत सही लिखा आपने केजरीवाल जी ने जो चुनावी वादा किया था तो उन्हें भी नहीं पता था की मुझे इ करना भी पड़ेगा अब सर पे आ गयी तो भाग रहे है

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  4. बहुत सही लिखा आपने केजरीवाल जी ने जो चुनावी वादा किया था तो उन्हें भी नहीं पता था की मुझे इ करना भी पड़ेगा अब सर पे आ गयी तो भाग रहे है

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  5. वादा पूरा नहीं कर पाने के दर से केजरीवाल जी पलायनवादी हो गए है

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  6. @उन्‍होंने अत्‍यंत ही साफगोई से कहा कि क्‍या हो जाएगा अगर चुनावों में 400-500 करोड रूपये खर्च हो जाएंगे तो ? कम से कम एक स्‍थाई सरकार तो आएगी,
    मनोज कुमार जी ,पहले मई बता दूँ कि मैं किसी पार्टी का सपोर्टर नहीं | आपका उपरोक्त कथन सही कथन नहीं है .मैंने भी उनका इंटरव्यू देखा था |उन्होने कहता था ,"लोग कहते है कि दुबारा चुनाव में एक राज्य के लिए करीब सौ करोड़ का खर्चा आयेगा .....तो होने दीजिये ......ये लोग तो एक ठेके में 500 -600 करोड़ खा जाते हैं ........." आआगे आपकी बात ठीक है |
    जहां तक वादा करने की बात है, कौनसा पार्टी ऐसा है जो लो लुभावन वायदा नहीं करता है ? कांग्रेस ,बी जे पी सब कर चुके है और चुनाव के बाद भूल चुके हैं .कांग्रेस गरीब को भूल चुके है .बी जे पी राम को भूल चुके है ,सभी पार्टी की कमजोरिय गिनाया जा सकता है ."आप " नया है | इसके सत्तारुद होनेपर उसके कार्य देखकर ही कुछ बताया जा सकता पूर्वाग्रही होकर कुछ बताना सही नहीं होगा !
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    1. प्रसाद जी, मान ली आपकी बात और हो सकता है कि आप के द्वारा देखे गए इंटरव्‍यू में 100 करोड ही उन्‍होंने कहा हो, तो 400-500 को 100 करोड करके पढ लीजिए, बाकी मसला वही है, दूसरी बात यह कि कांग्रेस कह रही है कि हम बिना शर्त समर्थन करते हैं, तो फिर आप को सरकार बनाने में क्‍या दुश्‍वारी है, समझ नहीं आता, सच तो यह है कि यह आप के मन का पाप है, जो उन्‍हें सत्‍ता नहीं स्‍वीकारने दे रहा

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