Monday, 22 October 2012

कजरी अर्थात राजनीतिक निर्मल बाबा !

मित्रों, इस दुनिया में दुःख हैं, तकलीफें है, समस्‍यायें है, और हम सभी लोग कमोबेश इससे पीडि़त भी, परन्‍तु इन्‍हीं सब के मध्‍य कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हमारी इन समस्‍याओं को अपने लिए सौभाग्‍य की सीढ़ी बनाने का कार्य करते हैं और अपना हित साधने का सम्‍पूर्ण यत्‍न करते हैं, अभी अधिक दिन नहीं हुए एक ठग ने लोगों पर कृपा बरसानी शुरू कर दी थी और दुःख और समस्‍याओं से घिरे आम-जन उसके चंगुल में फंसते ही चले जा रहे थे, याद तो होगा ही न आपको !

ठीक उसी प्रकार से सामाजिक जीवन में भी जनता भ्रष्‍टाचार रूपी दानव के कारण त्राहि-त्राहि कर रही है, राजनीतिक और सरकारी भ्रष्‍टाचार ने लोगों का जीना दुश्‍वार कर दिया है, ऊपर से निरन्‍तर बढ़ती जा रही कमरतोड़ मंहगाई जले पर नमक छिड़कने का कार्य करती है, तो फिर ऐसे में आम जनता की आत्‍मा से निकलने वाली आग पर अपनी रोटियां पकाने वाले नहीं निकलते, ऐसा भला कैसे हो सकता था ? तो निकल आये श्रीमान कजरी ! पहले लोगों को आन्‍दोलन का लालीपाप दिखाया, बिल्‍कुल बगुला भगत की तरह एक टांग पर खड़े हो दर्शाया कि वे किस प्रकार समाज सेवा रूपी तपस्‍या में लीन है !! परन्‍तु लोगों के उनके स्‍वांग पर‍ जरा सा विश्‍वास करने की क्रिया में उन्‍हें राजनीति रूपी मछली प्राप्‍त होती नजर आई और वे छपाक से कूछ पड़े अपनी महत्‍वाकांक्षा के दलदल में, बिना यह सोचे कि आखिर उन लोगों की भावनाओं का क्‍या होगा जो उन्‍हें भक्‍त समझ उनके पीछे हो लिए थे !! फिर क्‍या था, आडम्‍बर रूपी चोला उतरा तो अनेक साथ चलने वालों ने रास्‍ता बदल लिया, शायद किसी अन्‍य छाया की तलाश में !

तो मित्रों, मैं सोचता हूं कि आखिर इन दोनों ठगों में फर्क क्‍या है, एक ने जहां धनार्जन के लिए जनता को मूर्ख बनाया तो दूसरे ने राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए, जब प्रश्‍न पूछे गए तो एक अन्‍तर्ध्‍यान हो गया, दूसरा बचता घूम रहा है ! अच्‍छा आप ही कहिए कि क्‍यूं कजरी को दिग्विजय सिंह के प्रश्‍नों का जवाब नहीं देना चाहिए ? जब वे सबसे प्रश्‍न पूछते हैं तो उनकी अपेक्षा होती है कि उन्‍हें जवाब मिलें, परन्‍तु अपने ऊपर उठे प्रश्‍नों पर वह बहाना बना निकल जाना चाहते हैं !! आखिर क्‍यूं ? आखिर क्‍या हर्ज है अगर वह अपने एन.जी.ओ. द्वारा प्राप्‍त सहयोग राशि के विवरण को सार्वजनिक कर दें तो ! आख्रिर क्‍या हर्ज है यदि वह अपनी नौकरी से सम्‍बंधित प्रश्‍नों के जवाब दे दें तो ! आखिर क्‍या हर्ज है अगर वे उन दो करोड़ रूपयों का हिसाब दे दें तो जो वह अन्‍ना के पास लेकर गए थे ! यदि वे इन सवालों का जवाब देते तो क्‍या उनकी साख मजबूत नहीं होती ? क्‍या उनकी विश्‍वसनीयता बढ़ नहीं जाती ? परन्‍तु नहीं, न उन्‍होंने ऐसा किया है और न ही वह ऐसा करेंगे, कर सकेंगे ! क्‍योंकि उनके पास उन प्रश्‍नों के जवाब हैं ही नहीं, अतः उनका स्‍वयं का दामन भी धवल दिखाई नहीं देता !!!

परन्‍तु वे तो आम जनता की पार्टी बना रहे हैं न, तो उन्‍हें दिग्विजय सिंह जैसे राजनीतिज्ञ के साथ-साथ आम जनता के मन में भी उमड़-घुमड़ रहे प्रश्‍नों का भी जवाब देना चाहिए, तो क्‍या वे जवाब देंगे कि आख्रिर वे कौन से कारण है कि उनके पूर्व सहयोगी उनसे दूर होते जा रहे हैं ? क्‍यों अग्निवेश दूर हुए ? क्‍यूं किरण बेदी दूर हुई ? और क्‍यूं उन्‍होंने अन्‍ना की पीठ पर छूरा घोंपा ? आखिर क्‍यूं आम जनता को उन पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेना चाहिए ? फिर यह भी कि जो किसी के न हुए वे जनता के कैसे हो सकेंगे ? क्‍या गारंटी है कि वे अन्‍ना की तरह आम जनता के साथ भी छल और विश्‍वासघात नहीं करेंगे ? जी नहीं वे इन प्रश्‍नों का जवाब नहीं देंगे, राजनेता कभी भी प्रश्‍नों के जवाब नहीं दिया करते, वे तो सिर्फ प्रश्‍न करना जानते हैं !!

फिर भी कहूंगा कि यदि तुलनात्‍मक अध्‍ययन भी किया जाए तो दिग्विजय श्रेष्‍ठ है… उन्‍होंने मध्‍य प्रदेश जैसे बड़े राज्‍य की दस वर्ष सेवा की है, परन्‍तु कजरी तो किसी के हुए ही नहीं, उन्‍होंने क्‍या किया है ? तः ये तो मुझे कृपा बरसाने का दावा करने वाले उसी बाबा की तरह नजर आते हैं जो कि आज पटल से गायब है, याद कीजिएगा, कुछ दिनों तक उनका भी बोलबाला रहा, खूब तस्‍वीरें बिकी, खूब काले पर्स बिके, लेकिन जब मुखौटा उतरा तो उन्‍हें धराशायी होते देर न लगी, राष्‍ट्र को एक और मुखौटा उतर जाने की प्रतीक्षा है !!


मनोज

2 comments:

  1. बगुला भगत .... बहुत सुन्दर

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  2. अभी आपका सामना सरकार नाम की चीज से नही हुआ । वो अच्छो अच्छो का मुखौटा उतार सकती है । अगर सरकार कल आप हों तो आप किसी का भी मान मर्दन कर सकते हैं

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