Sunday, 14 October 2012

केजरीवाल जैसों के कारण अपराध बढ़ रहे हैं !

आप कहेंगे हुजूर क्‍या फरमाते हैं, दिमाग दुरूस्‍त है न आपका, भला कजरी (मेरे कुछ मित्रों को उन्‍हें कजरी कहना पसन्‍द नहीं आया, परन्‍तु क्‍या करूं, उनके आचरण को देखते हुए मैंने एक की मात्रा मात्र हटाई है) ने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया कि उनके कारण अपराध बढ़ रहे हैं ??


अच्‍छा तो फिर आप ही सोचिए, समाज में अपराध के अचानक बढ़ गए प्रवाह के प्रमुख कारण क्‍या हैं ? आप कहेंगे कि सरकार निकम्‍मी है और निश्चित रूप से कानून व्‍यवस्‍था की बिगड़ी हालत ने ही अपराध को बढ़ावा दिया है ! अब बताइये, कानून व्‍यवस्‍था स्‍थापित करने का कार्य कौन करता है ? जवाब होगा पुलिस तंत्र.. तो अब मैं पूछता हूं कि आखिर पुलिस तंत्र अपना कार्य क्‍यों नहीं कर रहा है ? अथवा क्‍यों नहीं कर पा रहा है ? आखिर है कहॉं ये पुलिस, तो आइये इसे समझने की कोशिश करते हैं कि पुलिस है कहां,   

मित्रों, देश, प्रदेश, राजधानी में सभी जगह पुलिस बल की संख्‍या में व्‍यापक कमी है, एक-एक सिपाही को दस से बारह घंटे की ड्यूटी तक देनी पड़ती है, ऐसे में आये दिन होने वाले कथित आन्‍दोलन हमारे पूरे पुलिसिया अमले को इनके पीछे लगा देते हैं, जिस पुलिस बल को अपर‍ाधियों के पीछे लग कर उन्‍हें पकड़ने का कार्य करना था, अब वे इस बात पर अपना सर धुनते नजर आते हैं कि आखिर इन (टिड्डी) समूहों को संसद तक जाने से कैसे रोका जाए, प्रधानमंत्री के आवास और दफतर तक जाने से कैसे रोका जाए, उनका महत्‍वपूर्ण समय इन कथित स्‍वयंभू समाजसेवियों के आगे पीछे करते बीत रहा है, ऐसे में यदि अपराध में वृद्वि हो रही है, तो उसका दोष कजरी और इन जैसे लोगों को क्‍यों नहीं दिया जाना चाहिए ? फिर आप ही कहिए ! अन्‍ना, बाबा और कजरी के आन्‍दोलन कहीं न कहीं क्‍या सामान्‍य प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में बाधा पहुंचाने का कार्य नहीं कर रहे, जो परोक्ष रूप से अपर‍ाधियों की मदद के समान है !!!

अब आप मुझसे पूछेंगे कि जब पूरे राष्‍ट्र में भ्रष्‍टाचार रूपी दानव खड़ा हो तो क्‍या उसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए ? जब शासन तंत्र का कार्य सिर्फ जनता को लूटना बन कर रह गया हो, तो क्‍या मौन धारण करना उचित होगा ? और फिर इस प्रकार से तो देश में कोई आन्‍दोलन हो ही नहीं पायेगा !! तो मैं कहूंगा कि जी नहीं, मेरा ऐसा कोई आशय कदापि नहीं है कि विरोध नहीं होना चाहिए, विरोध तो होना ही चाहिए, सरकार के दुराचरण का विरोध आवश्‍यक है, परन्‍तु एक तो उसके स्‍वरूप को बदलने की आवश्‍यक्‍ता अधिक है, याद कीजिए कि अन्‍ना आन्‍दोलन के समय घरों की बत्तियां बुझा कर भी विरोध दर्ज कराया गया था, एस.एम.एस. के जरिए भी ऐसा ही कुछ किया गया था, कुछ वैसा ही या फिर और कुछ नवीन किए जाने की आवश्‍यक्‍ता है, विरोध के लिए प्रचार तंत्र का भरपूर सहारा लिया जाता रहा है और लिया जाना चाहिए, फिर क्‍या विरोध के लिए संसद पर्याप्‍त नहीं थी, क्‍या वहां विरोध नहीं हो रहा था, वहां भी विरोध हो रहा था, सरकार पर उसकी जनविरोधी नीतियों के विरूद्व दबाव बनाया जा रहा था, फिर सड़क पर उतरने की आवश्‍यक्‍ता क्‍यूं, चलिए उतरे तो फिर भी आज ऐसा विरोध उचित नहीं जो कि प्रशासनिक व्‍यवस्‍था को प्रभावित करता हो, चुनावों के समय की बात हो तो बात और है, उस समय में अर्धसैनिक बलों और सीमा सुरक्षा बल के जवानों का भी सहयोग प्राप्‍त किया जाता है, जिन्‍हें सीमा से बुलाने में काफी धन भी व्‍यय करना पड़ता है और वह सामान्‍य दशा में सम्‍भव नहीं,   

फिर आन्‍दोलन और सत्‍याग्रह कभी भी दैनिक रूप से नहीं होते, यदि आप गांधी जी के आन्‍दोलनों को भी याद करेंगे तो किन्‍हीं दो महत्‍वपूर्ण आन्‍दोलन अथवा सत्‍याग्रहों के मध्‍य पर्याप्‍त अन्‍तराल हुआ करता था, फिर वहां उद्देश्‍य स्‍वार्थपूर्ण नहीं था, परन्‍तु यहां ऐसा नहीं है, अतः आज के अर्थहीन आंदोलन सामान्‍य प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में व्‍यवधान डाल कहीं न कहीं परोक्ष रूप से ही स‍ही अपराध को बढ़ावा देने में मदद पहुंचा रहे हैं,

कजरी की बात करें तो एक तरफ उनके अब के आन्‍दोलन सामाजिक न होकर राजनीतिक हो चले हैं, तो दूसरी ओर दैनिक भी, आज कजरी समाज की चिन्‍ता में कम और अपनी राजनीतिक जमीन तलाशते अधिक दिखाई देते हैं, जिसकी बेचैनी भी स्‍पष्‍ट देखी जा सकती है, परन्‍तु इस कार्यकलाप को तत्‍काल रोके जाने की आवश्‍यक्‍ता है, ताकि पुलिस प्रशासन अपने वा‍स्‍तविक कार्यों को अंजाम दे अपराधों को रोक सके, वैसे आप क्‍या सोचते हैं इस बारे में, अवश्‍य बताइयेगा,


मनोज

2 comments:

  1. ऐसे में यदि अपराध में वृद्वि(वृद्धि ,वृद्धि )... हो रही है, तो उसका दोष कजरी और इन जैसे लोगों को क्‍यों नहीं दिया जाना चाहिए ? फिर आप ही कहिए ! अन्‍ना, बाबा और कजरी के आन्‍दोलन कहीं न कहीं क्‍या सामान्‍य प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में बाधा पहुंचाने का कार्य नहीं कर रहे, जो परोक्ष रूप से अपर‍ाधियों की मदद के समान है !!!

    आप मनोज जी ,सलाम खुर्शीद की भाषा का अपहरण कर रहें है .

    कजरी की बात करें तो एक तरफ उनके अब के आन्‍दोलन सामाजिक न होकर राजनीतिक हो चले हैं, तो दूसरी ओर दैनिक भी, आज कजरी समाज की चिन्‍ता में कम और अपनी राजनीतिक जमीन तलाशते अधिक दिखाई देते हैं, जिसकी बेचैनी भी स्‍पष्‍ट देखी जा सकती है, परन्‍तु इस कार्यकलाप को तत्‍काल रोके जाने की आवश्‍यक्‍ता है, ताकि पुलिस प्रशासन अपने वा‍स्‍तविक कार्यों को अंजाम दे अपराधों को रोक सके, वैसे आप क्‍या सोचते हैं इस बारे में, अवश्‍य बताइयेगा,

    सोचना क्या है ऐसा निष्कर्ष तो गोरों ने भी नहीं निकाला था आप तो महात्मा गाँधी की आत्म कथा नियमित प्रकाशित कर रहें हैं .केजरीवाल तब भी थे अब भी हैं अब कहीं कहीं कोई कोई है तब एक केजरी आपके शब्दों में कजरी आन्दोलन ही उठा था ,न होता तो देश आज़ाद न होता ..

    वैसे बतला दें आपको ,कजरी और ठुमरी बहुत ऊंचे पाए की गायकी है जिसका भाव पक्ष और उच्चारण केजरीवाल साहब के उच्चारण की तरह ही स्पस्ट होता है यह ख्याल से भिन्न है ,मुलायम जी इसी शैली में बोलने में माहिर हैं शब्द खा जातें हैं ,अलावा इसके नाक से बोलने के लिए अभिशप्त हैं

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  2. ऐसे में यदि अपराध में वृद्वि(वृद्धि ,वृद्धि )... हो रही है, तो उसका दोष कजरी और इन जैसे लोगों को क्‍यों नहीं दिया जाना चाहिए ? फिर आप ही कहिए ! अन्‍ना, बाबा और कजरी के आन्‍दोलन कहीं न कहीं क्‍या सामान्‍य प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में बाधा पहुंचाने का कार्य नहीं कर रहे, जो परोक्ष रूप से अपर‍ाधियों की मदद के समान है !!!

    आप मनोज जी ,सलाम खुर्शीद की भाषा का अपहरण कर रहें है .

    कजरी की बात करें तो एक तरफ उनके अब के आन्‍दोलन सामाजिक न होकर राजनीतिक हो चले हैं, तो दूसरी ओर दैनिक भी, आज कजरी समाज की चिन्‍ता में कम और अपनी राजनीतिक जमीन तलाशते अधिक दिखाई देते हैं, जिसकी बेचैनी भी स्‍पष्‍ट देखी जा सकती है, परन्‍तु इस कार्यकलाप को तत्‍काल रोके जाने की आवश्‍यक्‍ता है, ताकि पुलिस प्रशासन अपने वा‍स्‍तविक कार्यों को अंजाम दे अपराधों को रोक सके, वैसे आप क्‍या सोचते हैं इस बारे में, अवश्‍य बताइयेगा,

    सोचना क्या है ऐसा निष्कर्ष तो गोरों ने भी नहीं निकाला था आप तो महात्मा गाँधी की आत्म कथा नियमित प्रकाशित कर रहें हैं .केजरीवाल तब भी थे अब भी हैं अब कहीं कहीं कोई कोई है तब एक केजरी आपके शब्दों में कजरी आन्दोलन ही उठा था ,न होता तो देश आज़ाद न होता ..

    वैसे बतला दें आपको ,कजरी और ठुमरी बहुत ऊंचे पाए की गायकी है जिसका भाव पक्ष और उच्चारण केजरीवाल साहब के उच्चारण की तरह ही स्पस्ट होता है यह ख्याल से भिन्न है ,मुलायम जी इसी शैली में बोलने में माहिर हैं शब्द खा जातें हैं ,अलावा इसके नाक से बोलने के लिए अभिशप्त हैं


    बेशक लेखन में एक रचनात्मक आंच का होना ज़रूरी है सिल्वर टोन मी गायकी हो सकती है मुकेश की तरह लेखन नहीं .

    मत कहो आकाश में कोहरा घना है ,

    यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना

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